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खुशियाँ बाँटें सारे जग को


देखो सूरज नित्य-नियम से 
किरणों से नहलाता है।
और चाँद भी नील गगन से,
शीतलता पहुँचाता है।


नदियाँ भी इठलाकर कहती,
चाहे पी लो जितना पानी।
और बाँटती धरती माता,
हरे खेत को चूनर धानी। 


कुहू-कुहू की तान सुरीली,
कोयल रोज़ सुनाती है।
कलरव करने चिड़िया रानी, 
भिनसारे आ जाती है।


अंधकार को दूर भगाकर, 
कर देता दीपक उजियारा। 
फूल लुटाकर अपनी खुशबू,
महका देते उपवन सारा।


मीठे फल और छाया देने, 
पेड़ सदा झुक जाते हैं। 
बादल भी लाकर के पानी, 
सबकी प्यास बुझाते हैं।


परोपकार का जीवन इनका 
सचमुच बड़ा महान है। 
खुशियाँ बाँटें सारे जग को, 

वही सच्चा इनसान है।